शनिवार, 30 नवंबर 2013

पेड न्यूज मतलब मैच फिक्सिंग

पेड न्यूज मतलब मैच फिक्सिंग
मीडिया आधुनिक समाज का आईना है और यह भी सर्वविदित है कि आईना झूठ नहीं बोलता है परंतु आजकल इस आईने के बदले तेवर देखने को मिल रहे हैं। पेड न्यूज के द्वारा प्रतिबिम्ब ऐसे बनाए जा रहे हैं कि जिसमें स्वार्थ को विज्ञापित करके पाठकों को सम्मोहित किया जाता है। क्रिकेट के मैच फिक्सिंग की तरह ही पेड न्यूज पत्रकारिता के लिए संकट बनकर उभरा है।
पेड न्यूज वह खबर है जो धन देकर प्रकाषित और प्रसारित कराई गयी हो। यह प्रायः राजनैतिक चुनावों में देखने को मिल रहा है जब प्रत्याषी अपना चुनावी खर्च कम दिखाने के लिए विज्ञापन के बदले खबर छपवाते हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि खबर विज्ञापन के बदले ज्यादा विष्वसनीय होती है।
पहले न्यूज को प्वाइंट आॅफ व्यू माना जाता था किन्तु वैष्वीकरण के इस दौर में न्यूज मात्र प्वाइंट आॅफ व्यू नहीं रही बल्कि प्रोडक्ट भी बन गई है। इसीलिए इसमें वही सब बुराइयां स्थापित होने लगी जो प्रोडक्ट में होती है। उत्पाद का सम्बंध व्यापार से है और व्यापार के लिए आवष्यक है व्यावहारिकता न कि सैद्धांतिकता। इसी वजह से मीडिया की दुनिया में प्रयोज्यता को वरीयता दी जाती है। मूलतः प्रयोज्यता संचार को जन-जन तक अग्रेशित करने के संदर्भ में प्रयुक्त की जाती है। किन्तु आजकल जिस प्रकार षब्दों के सही अर्थ विलुप्त हो रहे है उसी का परिणाम है कि प्रयोज्यता का अर्थ भी मीडिया में अर्थोपार्जन हो गया है।
भारत में पत्रकारिता की संकल्पना जनहित को को मूल में रखकर की गई थी स्वतंत्रता संग्राम में मीडिया की भूमिका की गहन छानबीन से इस बात की पुश्टि होती है कि पत्रकारिता किसी व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति से परे भारत की आजादी और उसके नवनिर्माण का समर्पित थी। इसी वजह से तत्कालीन समाचार पत्र-पत्रिकाओं की बागडोर स्वतंत्रता सेनानियों के हाथ में थी। परंतु आज पत्रकारिता का परिदृष्य पूरी तरह से बदल चुका है यह मिषन से प्रोफेषन हो चुकी है। प्रिन्ट हो या इलेक्ट्राॅनिक मीडिया दोनों ही कारपोरेट कल्चर में पूरी तरह से रंग चुके हैं। समाचार के तत्वों में प्रमुख है सत्यता और विष्वसनीयता। इससे समझौता करने का मतलब है कि मीडिया अपने मूल कर्तव्यों से विमुख हो रहा है।

सम्पादकों को या तो नाम मात्र का बना दिया गया है या फिर उस स्थान पर प्रबंधकों या पत्र-स्वामियों ने कब्जा कर लिया है। जिनका एकमात्र उद्देष्य मुनाफाखोरी है। मुनाफाखोरी  में आयकर की चोरी आमबात है। विज्ञापन से इतर पेड न्यूज में न तो आय का लेखा-जोखा रखने की जरूरत है न ही आयकर का झंझट।
खुद वित्तमंत्री भी स्वीकार कर चुके हैं कि देष में बड़ी मात्रा में काला धन है। इस से सभी वाकिफ हैं कि यह धन किस-किस के पास है। ये ही लोग चुनाव में नोट-वोट का खेल खेलते हैं। कुछ समय पहले तक इस खेल में मतदाताओं को भौतिक रूप से लुभाया जाता रहा है किन्तु आजकल हर खेल की तरह इस खेल में भी तकनीकी बदलाव हुए। इसी वजह से नोट-वोट के खेल में मतदाताओं को मनोवैज्ञानिक रूप से भी प्रभावित करने के लिए पेड न्यूज का सहारा लिया जा रहा है। इससे बड़े लाभ की यह बात है कि इसमें काले धन का करीने से सदुपयोग किया जाता है।
किसी तात्कालिक घटना, विचार या समस्या जिसमें जन अभिरूचि विद्यमान हो, को समाचार कहा जाता है। मीडिया ही एकमात्र ऐसा स्तंभ हैै जिसकी जन-जन में साख और विष्वसनीयता बरकरार है। लेकिन जब जन पर धन को वरीयता दी जाएगी तो  लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ के नाम से अलंकृत मीडिया को भी सवालिया कठघरे में खड़ा होना पड़ेगा।
मीडिया को मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह सबसे भद्दा मजाक है। पेड न्यूज ने सारी हदें पार कर दी हैं। इसी कारण दूसरों पर अंगुलि उठाने वाले मीडिया पर भी लोगों ने आरोप लगाना षुरू कर दिया है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों तरफ से आवाजें उठने लगी हैं कि पे्रस कौंसिल इसके लिए जरूरी कदम उठाए जिससे पेड न्यूज की समस्या का निपटारा किया जा सके।
द एडिटर्स गिल्ड आॅफ इंडिया और द इंडियन वीमेन्स प्रेस काप्र्स के द्वारा आयोजित सेमिनार ’’पेड न्यूज’’ में सीपीएम महासचिव प्रकाष करात ने पेड न्यूज को चुनाव-प्रक्रिया का उल्लंघन घोशित करने की मांग की। जिसका पुरजोर समर्थन करते हुए लोकसभा में विपक्ष की नेता सुशमा स्वराज ने कहा कि यदि चुनाव आयोग के पास इससे निपटने के लिए पर्याप्त षक्तियां नहीं हैं तो एक्ट में संषोधन के लिए संसद में बिल प्रस्तुत करना चाहिए। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी पेड न्यूज का रोना रो रहे हैं लेकिन मजेदार तथ्य इस सेमिनार में चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैषी ने उजागर किया कि पेड न्यूज के बारे में कई दलों ने बताया है परंतु किसी ने औपचारिक रूप से कोई षिकायत दर्ज नहीं की है।
पेड न्यूज पर लगाम लगाना इतना आसान नहीं है। इस बात की पुश्टि करते प्रसार भारती की अध्यक्ष मृणाल पांडे का कहना है कि सम्पादक अकेले उत्तरदायी नहीं है कि समाचार पत्र में क्या प्रकाषित हो रहा है क्योंकि प्रत्येक संस्करण विभिन्न स्थानों से प्रकाषित होते हैं। बी.जी. वर्गीज का कहना है कि ’’ मीडिया अब चतुर्थ स्तम्भ नहीं रहा, बल्कि यह प्रथम स्तम्भ है। मीडिया सबसे षक्तिषाली बन चुका है।’’ वर्गीज का विचार आज की मीडिया के प्रत्येक क्षेत्र में बढ़ते हस्तक्षेप से जगजाहिर करता है।
                                        



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